भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई इबारत लिखते हुए जून 2025 तक 476 गीगावॉट की कुल स्थापित बिजली क्षमता हासिल कर ली है। यह उपलब्धि न सिर्फ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम है, बल्कि हरित और टिकाऊ विकास के नए युग की शुरुआत भी है। भारत अब केवल कोयले पर निर्भर नहीं है—गैर-जीवाश्म ईंधनों से कुल 49 प्रतिशत बिजली उत्पादन क्षमता के साथ देश ने हरित ऊर्जा की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।
प्रधानमंत्री सूर्य घर और पीएम-कुसुम जैसी योजनाओं ने ग्रामीण और शहरी भारत को सौर ऊर्जा से जोड़ते हुए 2025 तक 30 गीगावॉट अतिरिक्त सौर क्षमता जोड़ी है। अकेले इस वर्ष 23.8 गीगावॉट नई सौर क्षमता जुड़ी है। पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत 51.3 गीगावॉट क्षमता के साथ दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच चुका है।
जलविद्युत उत्पादन अब 48 गीगावॉट तक पहुंच गया है, जबकि जैव ऊर्जा से 11.6 गीगावॉट बिजली उत्पन्न की जा रही है। वहीं, परमाणु ऊर्जा की क्षमता 8.8 गीगावॉट हो चुकी है, जिसमें 25 परमाणु रिएक्टर योगदान दे रहे हैं। आने वाले वर्ष में और रिएक्टर जोड़े जाने की योजना भी तैयार है।
भारत सरकार का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इसके तहत अनुमानित 8 लाख करोड़ रुपये का निवेश और 6 लाख नई नौकरियाँ सृजित होंगी।
कोयला उत्पादन में 72 प्रतिशत की वृद्धि के बाद अब ध्यान पारदर्शिता, दक्षता और पर्यावरणीय संतुलन पर है। ऊर्जा क्षेत्र की यह क्रांति दर्शाती है कि भारत अब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में सशक्त रूप से आगे बढ़ रहा है।
















